Saturday, November 26, 2016

Solah Singar poem

सोलह सिंगार - कविता

कई महीने पहिले हमने साज सिंगार पर एक कविता लिखी थी। पर वह पारंपरिक बखान और ब्यौरों को लेते हुए भी, थोड़ी - बहुत अपनी कल्पना से ही बनी थी। और अब, हम ख़ुशी से प्रस्तुत करते हैं, पारंपरिक सोलह सिंगार के बूते लिखी हुई एक कविता। इसमें तुक बाँधने पर काफ़ी मेहनत लगी है! 

सोलह सिंगारों की एक सूची (इस विषय पर कई विवेचनाएँ और पुरानी पोथियाँ लिखी गई हैं और उनमें अलग सूचियाँ भी मिल सकती हैं): 

१. उबटन आदि लेपों को काया पर लीपना
२. नहा - धोकर स्वच्छ होना 
३. स्वच्छ और सलोने पहनावे ओढ़ना 
४. बाल सँवारना 
५. आँखों में काजल की धारें लगाना 
६. माँग में सिंदूर भरना 
७. तलवों को महावर से लाल रंगना 
८. माथे पर बिंदी या तिलक लगाना 
९. ठोड़ी पर तिल बनाना 
१०.  मेहंदी लगाना 
११. इत्र - अरगज आदि सुगंध भरना 
१२. भाँत - भाँत के गहने पहनना
१३. झौर (फूलों का हार) पहनना 
१४. दाँतों को मिस्सी लगाके चमकाना 
१५. पान खाकर मुँह को सुगंधित और पान के रंग में रंगना 
१६. होंठों को लाल रंगना 

अब हमारी कविता पढ़ें :  

सोलह सिंगार सजाइकै नार बनायौ ढार बड़ौ मनहार
उबटन लगाए तन को लिपाए जल माँहिं न्हाए अंग पखराए 
केस कुँ सँवारि बेनी में बारि काजल की कारी आँख पै धारि 
माँगहिं उघाड्यौ सिंदूरहिं चाढ्यौ पाँय कों पसार्यौ महावर डार्यौ 
ललाट पै बिंद जामिन पै इंद ठोड़ी पै मूँद तिल लाग्यौ बूँद 
चीत मेहंदी कौ हाथनि में नीकौ गंध सूँघु दीखी नाहीं जु तीखी 
मनियन जड़े आभूसन पड़े गीब परि ठाढ़ी झौर की लाड़ी 
माँजिकरि दाँति सेती रची पाँति पान की भाँति भई बदन कांति
होंठ रंग रातौ बरन कौ धातौ अरु गही गातु सुबसन कौ नातौ 
या बिध बखानत जो जन जानत सुंदर मानत रूप पिछानत 

आस है कि यह आपको भाई हो। पर आपकी राय में और कोई सजावट भली लगे तो उसे भी हम अपने आप में सही ही मानते हैं, प्यारे पाठकजनों, अंतिम पंक्ति को उसके विरुद्ध नहीं समझें!  

© Vidur Sury. All rights reserved
© विदुर सूरी। सर्वाधिकार सुरक्षित 

Tuesday, November 22, 2016

Abhisarika Nayika - 2 metres

अभिसारिका नायिका 

- दो छंदों/लयों में एक ही कविता  

हमने कई दिन पहिले एक छंद या लय में अभिसारिका नायिका, अर्थात पिया मिलन के लिए जानेवाली नायिका पर एक कविता लिखी थी। उससे कुछ दिन पीछे उसी विषय पर अलग ही लय में कुछ पद सूझे, उसी की उमंग में एकाध दिन पीछे हम पूरी कविता लिख बैठे। दोनों मीठी ब्रज भाषा में है। 

प्राचीन भारतीय कला और साहित्य में, भारो - आर्य संस्कृति के उद्भव से लेकर बड़े समाज की संस्कृति में (जोकि भारत में प्रायः भारो - आर्य है), नायक और नायिकाओं का वर्गीकरण हुआ है। यह साहित्य के प्रमुख पत्रों, नाट्यशास्त्र और उससे जुड़ी सारी नाट्य (जिनमें यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है) और कला की परम्पराओं, और इसीके बारे में लिखे गए मध्यकालीन ग्रंथ, और बहुतेरी भारतीय कलाओं (नाट्य, नृत्य, गीत - वाद्य और गाथा, चित्र, स्थापत्य कलाएँ) में मिलता है। नायिका के आठ प्रकार माने गए हैं:

१. वासकसज्जा नायिका - 'वसनों या वस्त्रों से सजी', अपने आनेवाले बालम से मिलाप के चाव में, मन में उछाह भरे, उसकी बाट देखती हुई।
२. विरहोत्कंठिता नायिका - 'बिरह के मारे पिया से मिलने के लिए उतावली', जो अपने पिया से बिछोह को नहीं झेल पा रही होती है। 
३. स्वाधीनभर्तृका नायिका - 'अपने बस में पति या प्रेमी को रखी हुई', जिसकी सजन से कोई अनबन नहीं हुई हो और जो निश्चिन्त उसके साथ में आनंदित हो। 
४. कलहान्तरिता नायिका - 'राड़ मचने से खलबली भरी', झमेले के समाप्त होने पर जो पिया से मिलना चाह रही हो। 
५. खंडिता नायिका - 'क्रुद्ध', अपने प्रीतम से व्यभिचार रचने के संदेह में रूठी हुई और बहुत ही कुपित नायिका। 
६. विप्रलब्धा नायिका - 'प्रेमी से धोखा खाई हुई', जिसके बलम ने परायी नारी के संग में रहकर नायिका से छल किया हो। 
७. प्रोषितभर्तृका नायिका - 'जिसका पति किसी काम से कहीं सिधारा हो', और वह उसके साथ रहने के लिए बिकल और  बेचैन हो। 
८. अभिसारिका नायिका - 'पिया से मिलाप के लिए निकलती हुई', चुपके से जो अपने साजन से मिलने जा रही हो, जिस पर ये कविताएँ भी लिखी गई हैं।

इन कविताओं में पारंपरिक चित्रण और बरनन - ब्यौरे लिए गए हैं, पर कहीं अंध विश्वासवाली व्यर्थ नहिक और टुच्ची, अनस्तमान सोच (भूत प्रेत इत्यादि) को निरा छोड़ा गया है।

१. अभिसारिका नायिका - छंद १ 

पिय सौं मिलिबे घर तें वह कढ़ी, देहरी कुँ डाँकि पाँव तें अपने।
लिए आस बलम के मिलन की चली बनिता सजा - धजाकर तन को॥
लुक - लाज कों छाँड़ सबै सिगरी, देर रात की बेला में चली।
धीमी धुन तें धीरे - धीरे, डरपत कोई जाग न जावै॥
पायल की झन - झन मंदसुरी, अगरी लगी धीरे बिना खटके।
द्वार के परे, गेह के बहार, अंधियारी रात माँहिं काँपै॥
इत फँसी ओढ़नी जड़ सौं बिरछ के, तो कोमल हाथनि तें छुड़ाई।
उत भेड़िये की चीख गूँजी, चमगादड़नि दल उड़ि आयौ॥
गाछ बिपल्लव धड़ ही रह्यौ, टहनी पर बैठ्यौ गिद्ध भूखौ।
भू पर सरर सरप रहे नाग, भय सौं धक - धक धड़के हिया॥
बन के बीच भटक ना जावै, अपने पिय के ढिग ही पहुँचै।
धीर धरि धीरे - धीरे सो अपने सइयाँ कौ संग गही॥

२. अभिसारिका नायिका - छंद २ 

पी सौं मिलिबे की लइ आस हिय में वह गई, साज सिंगार सजि नार घर तें निकसी।
काज लोकलाज गए, आज गई पारि करि द्वार - देहरी कों परी नाहीं काहुँकुँ भनक।
धीमी धरि चाल अरु किंवाड़ कुंडी जकड़ी, अत ही बिलमाई रजनी की बेला माँहिं।
आई घबराई सुनसान अंधियारे में, मूल रुखड़े ने दियौ फाँसि चुनरी कौ सिरौ।
हाथ सुकुमार तें छुड़ायौ तद आँचल कों, भेड़िया चिल्लायौ कहीं दूर तें ऊँचे सुर में।
झुंड चमगादड़नि कौ उड़िकै आनि पड़्यौ, झाड़िकरि पातिन बिरछ धड़ ही सेस भयौ।
जाकी साखा पै बिराजै भूखौ गिद्ध, रेंगत धरा पै तिरछौहें पीवर साँप।
मारे भय के चकित होय धड़के हृदय, मन भी अकुलावै भौचक्के बिचारनि तें।
बाट भटके न जावै साजन के ही ढिग, लाग्यौ खटकौ यह मन माँहिं तु संभारि लई।
ठानि दृढ़ मानि संकल्प करि आगे बढ़ी, पाई बलमाहिं, आनंद कौ ठिकानौ नहीं।

शब्दों को छंद में समाने का और उसकी उपज के तो अलग ही मज़े है! हम आस करते हैं कि हमारे प्यारे पाठकजनों को भी ये रचनाएँ भाई हों।
© Vidur Sury. All rights reserved
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Sunday, August 14, 2016

Learn many Indian languages from Hindi!

अब हिंदी से सीखें कई दूसरी भारतीय भाषाएँ !

 भारतीय भाषाएँ बहुतेरी भाषा परिवारों में बँटी हुई हैं।  इनमें से एक बहुत ही प्रधान और प्रचलित भाषा परिवार है - भारो - आर्य भाषा परिवार (अंग्रेजी में Indo - Aryan languages)। इसके अन्तर्गत अनेक प्रधान भाषाएँ मिलती हैं, जैसे - हिंदी, पंजाबी, सिंधी, बंगाली, गुजराती, मराठी, ओड़िया, असमिया, कोंकणी, कश्मीरी और इन सबकी पुराविन संस्कृत भी। समय के चलते भारत के प्रति क्षेत्र की अपनी अनूठी संस्कृति पनपी, और इस परिवार की प्रत्येक भाषा अनोखी और अन्य भाषाओं से अलग बन गई। आज एक भाषा के वक्ता को दूसरी भाषा समझने में, कई बार, बहुत झंझट होती है।  तब भी, इन सभी में कुछ समान तत्व विद्यमान हैं और थोड़ी कोशिश और जिज्ञासा से एक भाषा से दूसरी भाषा सीखी जा सकती है।  

तो चलिए, इनमें से एक महान और सबसे प्रचलित भाषा और राष्ट्रीय भाषा, हिंदी से, छः और सुन्दर भाषाएँ सीखते हैं - पंजाबी, बंगाली, गुजराती, मराठी, ओड़िया और संस्कृत।  

इन सात भाषाओं का एक संक्षिप्त परिचय :

१. हिंदी - भारत की एक राष्ट्रीय भाषा, इसे बोलनेवालों की संख्या सबसे अधिक है।  अधिकतर उत्तर और मध्य भारत में समझी जाती है। सही हिंदी भाषाओं के मूल निवास स्थान हैं - हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़। राजस्थान में हिंदी अत्यंत प्रचलित है, और राजस्थानी भाषाएँ पश्चिमी भाषाएँ होने पर भी हिंदी से बहुत मिलती - जुलती हैं।  सबसे जानी - मानी हिंदी भाषा है (जिसमें यह लेख भी लिखा गया है), खड़ी बोली, जिसे कौरवी भी कहते हैं और अधिकतर लोग इसे 'हिंदी' ही कहते हैं। हिंदी में 'होना' क्रिया शब्द के रूप वाक्यों के महत्वपूर्ण अवयव हैं, इसमें सभी कालरूप, २ वचन, २ लिंग (निर्जीव वस्तुओं को भी पुल्लिंग या स्त्रीलिंग दिया जाता है), वैयाकरणिक लिंग (विशेषण, क्रिया शब्द, आदि लिंग के आधीन हैं) उपस्थित हैं। कहा जा सकता है कि सभी अन्य भारो - आर्य भाषाओं से हिंदी की थोड़ी - बहुत समानता है।

२. पंजाबी - पंजाब की भाषा (दोनों भारत और पाकिस्तान की अलग - अलग पंजाबी उपभाषाएँ हैं), और हिमाचल प्रदेश, जम्मू की भाषाएँ भी इससे काफ़ी मिलती हैं। इसका व्याकरण हिंदी से बहुत मेल खाता है।  इसमें 'घ', 'झ', 'ढ', 'ध', 'भ' वर्णों के उच्चारण हिंदी से भिन्न हैं और बोलने का ढंग भी कुछ अलग है, और इसका एक अक्षर 'ळ' हिंदी में नहीं मिलता।  । 

३. बंगाली - बंगाल की भाषा (दोनों भारत और बांगलादेश की अपनी - अपनी उपभाषाएँ हैं), और सबसे प्रचलित पूरब भारतीय भाषा है। असमिया से भी कुछ मिलती है। इसमें और अन्य पूर्वी भारो - आर्य भाषाओं के जैसे ही, 'होना' क्रिया शब्द के रूप उद्देश्य और वस्तु दोनों के होते हुए जोड़े नहीं जाते, एवं वैयाकरणिक लिंग इसमें नहीं होते, और वचनों का क्रिया शब्दों पर कम प्रभाव पड़ता है। इस भाषा में 'अ', 'ऐ', 'औ', 'ण', 'र', 'स', 'क्ष', 'ज्ञ' के उच्चारण हिंदी से पृथक हैं। 

४. गुजराती - गुजरात की भाषा। इसका व्याकरण हिंदी और मराठी, दोनों से थोड़ा - बहुत मिलता है। इसमें 'ऋ', 'ॠ', 'लृ', 'ॡ', 'ऐ', 'औ', 'ज्ञ' के उच्चारण हिंदी से अलग हैं, और इसका एक अक्षर 'ळ' हिंदी में नहीं मिलता। 

५. मराठी - महाराष्ट्र की भाषा। व्याकरण हिंदी और गुजराती दोनों से थोड़ा - बहुत मिलता है। इसमें 'ऋ', 'ॠ', 'लृ', 'ॡ', 'ऐ', 'औ', 'च', 'ज' 'झ', 'ज्ञ' के उच्चारण हिंदी से अलग हैं, और इसका एक अक्षर 'ळ' हिंदी में नहीं मिलता।  

६. ओड़िया - ओड़िशा की भाषा, झारखण्ड में भी बोली जाती है, और पूरब छत्तीसढ़ की भाषाएँ भी इससे बहुत मिलती हैं। व्याकरण पूर्वी भारतीय भाषाओं के वर्ग का है, तो इसमें भी 'होना' क्रिया शब्द के रूप उद्देश्य और वस्तु दोनों के होते हुए जोड़े नहीं जाते, एवं वैयाकरणिक लिंग इसमें नहीं होते, और वचनों का क्रिया शब्दों पर कम प्रभाव पड़ता है। इस भाषा में 'अ', 'ऋ', 'ॠ', 'लृ', 'ॡ', 'ऐ', 'औ', 'श', 'ष', 'क्ष', 'ज्ञ' के उच्चारण हिंदी से पृथक हैं, , और इसका एक अक्षर 'ळ' हिंदी में नहीं मिलता। 

७. संस्कृत - प्राचीन भारो - आर्य भाषा जिससे दूसरी भारो - आर्य भाषाएँ निरूपित हुईं।  इसके दो रूप हैं, वैदिक संस्कृत और शास्त्रीय संस्कृत। वैदिक संस्कृत वैदिक काल तक ही बोली जाती थी और शास्त्रीय संस्कृत उसका परवर्ती रूप है जो थोड़ा अलग है, और जिसके वैयाकरणिक नियम पाणिणि ने बताए। यह एक साहित्यिक भाषा ही रही है और पिछले समय में क्षेत्रीय प्राकृत भाषाएँ बोलचाल में बरती जाती थीं, जिनके विकास से आज की भारो - आर्य भाषाएँ उपजी हैं। इसका व्याकरण किसी एक और भाषा से नहीं मिलता, समानता रखते हुए भी कई रीतों से अलग है। 'ऐ', 'औ', 'ज्ञ' और कहीं - कहीं 'अं' की उचराइयाँ हिंदी से अलग हैं, और प्रत्येक अक्षर के बाद ज्यों के त्यों 'अकार' का उच्चारण भी होता रहता है, जो पूरी तरह से किसी भी पश्चात्कालीन भाषा में नहीं दिखता।  

अगले लेखों में हिंदी के माध्यम से ये भाषाएँ धीरे - धीरे सिखाई जाएँगी।