Sunday, August 14, 2016

Learn many Indian languages from Hindi!

अब हिंदी से सीखें कई दूसरी भारतीय भाषाएँ !

 भारतीय भाषाएँ बहुतेरी भाषा परिवारों में बँटी हुई हैं।  इनमें से एक बहुत ही प्रधान और प्रचलित भाषा परिवार है - भारो - आर्य भाषा परिवार (अंग्रेजी में Indo - Aryan languages)। इसके अन्तर्गत अनेक प्रधान भाषाएँ मिलती हैं, जैसे - हिंदी, पंजाबी, सिंधी, बंगाली, गुजराती, मराठी, ओड़िया, असमिया, कोंकणी, कश्मीरी और इन सबकी पुराविन संस्कृत भी। समय के चलते भारत के प्रति क्षेत्र की अपनी अनूठी संस्कृति पनपी, और इस परिवार की प्रत्येक भाषा अनोखी और अन्य भाषाओं से अलग बन गई। आज एक भाषा के वक्ता को दूसरी भाषा समझने में, कई बार, बहुत झंझट होती है।  तब भी, इन सभी में कुछ समान तत्व विद्यमान हैं और थोड़ी कोशिश और जिज्ञासा से एक भाषा से दूसरी भाषा सीखी जा सकती है।  

तो चलिए, इनमें से एक महान और सबसे प्रचलित भाषा और राष्ट्रीय भाषा, हिंदी से, छः और सुन्दर भाषाएँ सीखते हैं - पंजाबी, बंगाली, गुजराती, मराठी, ओड़िया और संस्कृत।  

इन सात भाषाओं का एक संक्षिप्त परिचय :

१. हिंदी - भारत की एक राष्ट्रीय भाषा, इसे बोलनेवालों की संख्या सबसे अधिक है।  अधिकतर उत्तर और मध्य भारत में समझी जाती है। सही हिंदी भाषाओं के मूल निवास स्थान हैं - हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़। राजस्थान में हिंदी अत्यंत प्रचलित है, और राजस्थानी भाषाएँ पश्चिमी भाषाएँ होने पर भी हिंदी से बहुत मिलती - जुलती हैं।  सबसे जानी - मानी हिंदी भाषा है (जिसमें यह लेख भी लिखा गया है), खड़ी बोली, जिसे कौरवी भी कहते हैं और अधिकतर लोग इसे 'हिंदी' ही कहते हैं। हिंदी में 'होना' क्रिया शब्द के रूप वाक्यों के महत्वपूर्ण अवयव हैं, इसमें सभी कालरूप, २ वचन, २ लिंग (निर्जीव वस्तुओं को भी पुल्लिंग या स्त्रीलिंग दिया जाता है), वैयाकरणिक लिंग (विशेषण, क्रिया शब्द, आदि लिंग के आधीन हैं) उपस्थित हैं। कहा जा सकता है कि सभी अन्य भारो - आर्य भाषाओं से हिंदी की थोड़ी - बहुत समानता है।

२. पंजाबी - पंजाब की भाषा (दोनों भारत और पाकिस्तान की अलग - अलग पंजाबी उपभाषाएँ हैं), और हिमाचल प्रदेश, जम्मू की भाषाएँ भी इससे काफ़ी मिलती हैं। इसका व्याकरण हिंदी से बहुत मेल खाता है।  इसमें 'घ', 'झ', 'ढ', 'ध', 'भ' वर्णों के उच्चारण हिंदी से भिन्न हैं और बोलने का ढंग भी कुछ अलग है, और इसका एक अक्षर 'ळ' हिंदी में नहीं मिलता।  । 

३. बंगाली - बंगाल की भाषा (दोनों भारत और बांगलादेश की अपनी - अपनी उपभाषाएँ हैं), और सबसे प्रचलित पूरब भारतीय भाषा है। असमिया से भी कुछ मिलती है। इसमें और अन्य पूर्वी भारो - आर्य भाषाओं के जैसे ही, 'होना' क्रिया शब्द के रूप उद्देश्य और वस्तु दोनों के होते हुए जोड़े नहीं जाते, एवं वैयाकरणिक लिंग इसमें नहीं होते, और वचनों का क्रिया शब्दों पर कम प्रभाव पड़ता है। इस भाषा में 'अ', 'ऐ', 'औ', 'ण', 'र', 'स', 'क्ष', 'ज्ञ' के उच्चारण हिंदी से पृथक हैं। 

४. गुजराती - गुजरात की भाषा। इसका व्याकरण हिंदी और मराठी, दोनों से थोड़ा - बहुत मिलता है। इसमें 'ऋ', 'ॠ', 'लृ', 'ॡ', 'ऐ', 'औ', 'ज्ञ' के उच्चारण हिंदी से अलग हैं, और इसका एक अक्षर 'ळ' हिंदी में नहीं मिलता। 

५. मराठी - महाराष्ट्र की भाषा। व्याकरण हिंदी और गुजराती दोनों से थोड़ा - बहुत मिलता है। इसमें 'ऋ', 'ॠ', 'लृ', 'ॡ', 'ऐ', 'औ', 'च', 'ज' 'झ', 'ज्ञ' के उच्चारण हिंदी से अलग हैं, और इसका एक अक्षर 'ळ' हिंदी में नहीं मिलता।  

६. ओड़िया - ओड़िशा की भाषा, झारखण्ड में भी बोली जाती है, और पूरब छत्तीसढ़ की भाषाएँ भी इससे बहुत मिलती हैं। व्याकरण पूर्वी भारतीय भाषाओं के वर्ग का है, तो इसमें भी 'होना' क्रिया शब्द के रूप उद्देश्य और वस्तु दोनों के होते हुए जोड़े नहीं जाते, एवं वैयाकरणिक लिंग इसमें नहीं होते, और वचनों का क्रिया शब्दों पर कम प्रभाव पड़ता है। इस भाषा में 'अ', 'ऋ', 'ॠ', 'लृ', 'ॡ', 'ऐ', 'औ', 'श', 'ष', 'क्ष', 'ज्ञ' के उच्चारण हिंदी से पृथक हैं, , और इसका एक अक्षर 'ळ' हिंदी में नहीं मिलता। 

७. संस्कृत - प्राचीन भारो - आर्य भाषा जिससे दूसरी भारो - आर्य भाषाएँ निरूपित हुईं।  इसके दो रूप हैं, वैदिक संस्कृत और शास्त्रीय संस्कृत। वैदिक संस्कृत वैदिक काल तक ही बोली जाती थी और शास्त्रीय संस्कृत उसका परवर्ती रूप है जो थोड़ा अलग है, और जिसके वैयाकरणिक नियम पाणिणि ने बताए। यह एक साहित्यिक भाषा ही रही है और पिछले समय में क्षेत्रीय प्राकृत भाषाएँ बोलचाल में बरती जाती थीं, जिनके विकास से आज की भारो - आर्य भाषाएँ उपजी हैं। इसका व्याकरण किसी एक और भाषा से नहीं मिलता, समानता रखते हुए भी कई रीतों से अलग है। 'ऐ', 'औ', 'ज्ञ' और कहीं - कहीं 'अं' की उचराइयाँ हिंदी से अलग हैं, और प्रत्येक अक्षर के बाद ज्यों के त्यों 'अकार' का उच्चारण भी होता रहता है, जो पूरी तरह से किसी भी पश्चात्कालीन भाषा में नहीं दिखता।  

अगले लेखों में हिंदी के माध्यम से ये भाषाएँ धीरे - धीरे सिखाई जाएँगी।

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