Saturday, November 26, 2016

Solah Singar poem

सोलह सिंगार - कविता

कई महीने पहिले हमने साज सिंगार पर एक कविता लिखी थी। पर वह पारंपरिक बखान और ब्यौरों को लेते हुए भी, थोड़ी - बहुत अपनी कल्पना से ही बनी थी। और अब, हम ख़ुशी से प्रस्तुत करते हैं, पारंपरिक सोलह सिंगार के बूते लिखी हुई एक कविता। इसमें तुक बाँधने पर काफ़ी मेहनत लगी है! 

सोलह सिंगारों की एक सूची (इस विषय पर कई विवेचनाएँ और पुरानी पोथियाँ लिखी गई हैं और उनमें अलग सूचियाँ भी मिल सकती हैं): 

१. उबटन आदि लेपों को काया पर लीपना
२. नहा - धोकर स्वच्छ होना 
३. स्वच्छ और सलोने पहनावे ओढ़ना 
४. बाल सँवारना 
५. आँखों में काजल की धारें लगाना 
६. माँग में सिंदूर भरना 
७. तलवों को महावर से लाल रंगना 
८. माथे पर बिंदी या तिलक लगाना 
९. ठोड़ी पर तिल बनाना 
१०.  मेहंदी लगाना 
११. इत्र - अरगज आदि सुगंध भरना 
१२. भाँत - भाँत के गहने पहनना
१३. झौर (फूलों का हार) पहनना 
१४. दाँतों को मिस्सी लगाके चमकाना 
१५. पान खाकर मुँह को सुगंधित और पान के रंग में रंगना 
१६. होंठों को लाल रंगना 

अब हमारी कविता पढ़ें :  

सोलह सिंगार सजाइकै नार बनायौ ढार बड़ौ मनहार
उबटन लगाए देहहिं लिपाए जल माँहिं न्हाए अंग पखराए 
केस कुँ सँवारि बेनी में बारि काजल की कारी आँख पै धारि 
माँगहिं उघाड्यौ सिंदूरहिं चाढ्यौ पाँय कों पसार्यौ महावर डार्यौ 
ललाट पै बिंद जामिन पै इंद ठोड़ी पै मूँद तिल लाग्यौ बूँद 
चीत मेहंदी कौ हाथनि में नीकौ गंध सूँघु दीखी नाहीं जु तीखी 
मनियन जड़े आभूसन पड़े गीब परि ठाढ़ी झौर की लाड़ी 
माँजिकरि दाँति सेती रची पाँति पान की भाँति भई बदन कांति
होंठ रंग रातौ बरन कौ धातौ अरु गही गातु सुबसन कौ नातौ 
या बिध बखानत जो जन जानत सुंदर मानत साज पिछानत 

आस है कि यह आपको भाई हो। पर आपकी राय में और कोई सजावट भली लगे तो उसे भी हम अपने आप में सही ही मानते हैं, प्यारे पाठकजनों, अंतिम पंक्ति को उसके विरुद्ध नहीं समझें!  

© Vidur Sury. All rights reserved
© विदुर सूरी। सर्वाधिकार सुरक्षित 

Tuesday, November 22, 2016

Abhisarika Nayika - 2 metres

अभिसारिका नायिका 

- दो छंदों/लयों में एक ही कविता  

हमने कई दिन पहिले एक छंद या लय में अभिसारिका नायिका, अर्थात पिया मिलन के लिए जानेवाली नायिका पर एक कविता लिखी थी। उससे कुछ दिन पीछे उसी विषय पर अलग ही लय में कुछ पद सूझे, उसी की उमंग में एकाध दिन पीछे हम पूरी कविता लिख बैठे। दोनों मीठी ब्रज भाषा में है। 

प्राचीन भारतीय कला और साहित्य में, भारो - आर्य संस्कृति के उद्भव से लेकर बड़े समाज की संस्कृति में (जोकि भारत में प्रायः भारो - आर्य है), नायक और नायिकाओं का वर्गीकरण हुआ है। यह साहित्य के प्रमुख पत्रों, नाट्यशास्त्र और उससे जुड़ी सारी नाट्य (जिनमें यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है) और कला की परम्पराओं, और इसीके बारे में लिखे गए मध्यकालीन ग्रंथ, और बहुतेरी भारतीय कलाओं (नाट्य, नृत्य, गीत - वाद्य और गाथा, चित्र, स्थापत्य कलाएँ) में मिलता है। नायिका के आठ प्रकार माने गए हैं:

१. वासकसज्जा नायिका - 'वसनों या वस्त्रों से सजी', अपने आनेवाले बालम से मिलाप के चाव में, मन में उछाह भरे, उसकी बाट देखती हुई।
२. विरहोत्कंठिता नायिका - 'बिरह के मारे पिया से मिलने के लिए उतावली', जो अपने पिया से बिछोह को नहीं झेल पा रही होती है। 
३. स्वाधीनभर्तृका नायिका - 'अपने बस में पति या प्रेमी को रखी हुई', जिसकी सजन से कोई अनबन नहीं हुई हो और जो निश्चिन्त उसके साथ में आनंदित हो। 
४. कलहान्तरिता नायिका - 'राड़ मचने से खलबली भरी', झमेले के समाप्त होने पर जो पिया से मिलना चाह रही हो। 
५. खंडिता नायिका - 'क्रुद्ध', अपने प्रीतम से व्यभिचार रचने के संदेह में रूठी हुई और बहुत ही कुपित नायिका। 
६. विप्रलब्धा नायिका - 'प्रेमी से धोखा खाई हुई', जिसके बलम ने परायी नारी के संग में रहकर नायिका से छल किया हो। 
७. प्रोषितभर्तृका नायिका - 'जिसका पति किसी काम से कहीं सिधारा हो', और वह उसके साथ रहने के लिए बिकल और  बेचैन हो। 
८. अभिसारिका नायिका - 'पिया से मिलाप के लिए निकलती हुई', चुपके से जो अपने साजन से मिलने जा रही हो, जिस पर ये कविताएँ भी लिखी गई हैं।

इन कविताओं में पारंपरिक चित्रण और बरनन - ब्यौरे लिए गए हैं, पर कहीं अंध विश्वासवाली व्यर्थ नहिक और टुच्ची, अनस्तमान सोच (भूत प्रेत इत्यादि) को निरा छोड़ा गया है।

१. अभिसारिका नायिका - छंद १ 

पिय सौं मिलिबे घर तें वह कढ़ी, देहरी कुँ डाँकि पाँव तें अपने।
लिए आस बलम के मिलन की चली बनिता सजा - धजाकर तन को॥
लुक - लाज कों छाँड़ सबै सिगरी, देर रात की बेला में चली।
धीमी धुन तें धीरे - धीरे, डरपत कोई जाग न जावै॥
पायल की झन - झन मंदसुरी, अगरी लगी धीरे बिना खटके।
द्वार के परे, गेह के बहार, अंधियारी रात माँहिं काँपै॥
इत फँसी ओढ़नी जड़ सौं बिरछ के, तो कोमल हाथनि तें छुड़ाई।
उत भेड़िये की चीख गूँजी, चमगादड़नि दल उड़ि आयौ॥
गाछ बिपल्लव धड़ ही रह्यौ, टहनी पर बैठ्यौ गिद्ध भूखौ।
भू पर सरर सरप रहे नाग, भय सौं धक - धक धड़के हिया॥
बन के बीच भटक ना जावै, अपने पिय के ढिग ही पहुँचै।
धीर धरि धीरे - धीरे सो अपने सइयाँ कौ संग गही॥

२. अभिसारिका नायिका - छंद २ 

पी सौं मिलिबे की लइ आस हिय में वह गई, साज सिंगार सजि नार घर तें निकसी।
काज लोकलाज गए, आज गई पारि करि द्वार - देहरी कों परी नाहीं काहुँकुँ भनक।
धीमी धरि चाल अरु किंवाड़ कुंडी जकड़ी, अत ही बिलमाई रजनी की बेला माँहिं।
आई घबराई सुनसान अंधियारे में, मूल रुखड़े ने दियौ फाँसि चुनरी कौ सिरौ।
हाथ सुकुमार तें छुड़ायौ तद आँचल कों, भेड़िया चिल्लायौ कहीं दूर तें ऊँचे सुर में।
झुंड चमगादड़नि कौ उड़िकै आनि पड़्यौ, झाड़िकरि पातिन बिरछ धड़ ही सेस भयौ।
जाकी साखा पै बिराजै भूखौ गिद्ध, रेंगत धरा पै तिरछौहें पीवर साँप।
मारे भय के चकित होय धड़के हृदय, मन भी अकुलावै भौचक्के बिचारनि तें।
बाट भटके न जावै साजन के ही ढिग, लाग्यौ खटकौ यह मन माँहिं तु संभारि लई।
ठानि दृढ़ मानि संकल्प करि आगे बढ़ी, पाई बलमाहिं, आनंद कौ ठिकानौ नहीं।

शब्दों को छंद में समाने का और उसकी उपज के तो अलग ही मज़े है! हम आस करते हैं कि हमारे प्यारे पाठकजनों को भी ये रचनाएँ भाई हों।
© Vidur Sury. All rights reserved
© विदुर सूरी। सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, August 14, 2016

Learn many Indian languages from Hindi!

अब हिंदी से सीखें कई दूसरी भारतीय भाषाएँ !

 भारतीय भाषाएँ बहुतेरी भाषा परिवारों में बँटी हुई हैं।  इनमें से एक बहुत ही प्रधान और प्रचलित भाषा परिवार है - भारो - आर्य भाषा परिवार (अंग्रेजी में Indo - Aryan languages)। इसके अन्तर्गत अनेक प्रधान भाषाएँ मिलती हैं, जैसे - हिंदी, पंजाबी, सिंधी, बंगाली, गुजराती, मराठी, ओड़िया, असमिया, कोंकणी, कश्मीरी और इन सबकी पुराविन संस्कृत भी। समय के चलते भारत के प्रति क्षेत्र की अपनी अनूठी संस्कृति पनपी, और इस परिवार की प्रत्येक भाषा अनोखी और अन्य भाषाओं से अलग बन गई। आज एक भाषा के वक्ता को दूसरी भाषा समझने में, कई बार, बहुत झंझट होती है।  तब भी, इन सभी में कुछ समान तत्व विद्यमान हैं और थोड़ी कोशिश और जिज्ञासा से एक भाषा से दूसरी भाषा सीखी जा सकती है।  

तो चलिए, इनमें से एक महान और सबसे प्रचलित भाषा और राष्ट्रीय भाषा, हिंदी से, छः और सुन्दर भाषाएँ सीखते हैं - पंजाबी, बंगाली, गुजराती, मराठी, ओड़िया और संस्कृत।  

इन सात भाषाओं का एक संक्षिप्त परिचय :

१. हिंदी - भारत की एक राष्ट्रीय भाषा, इसे बोलनेवालों की संख्या सबसे अधिक है।  अधिकतर उत्तर और मध्य भारत में समझी जाती है। सही हिंदी भाषाओं के मूल निवास स्थान हैं - हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़। राजस्थान में हिंदी अत्यंत प्रचलित है, और राजस्थानी भाषाएँ पश्चिमी भाषाएँ होने पर भी हिंदी से बहुत मिलती - जुलती हैं।  सबसे जानी - मानी हिंदी भाषा है (जिसमें यह लेख भी लिखा गया है), खड़ी बोली, जिसे कौरवी भी कहते हैं और अधिकतर लोग इसे 'हिंदी' ही कहते हैं। हिंदी में 'होना' क्रिया शब्द के रूप वाक्यों के महत्वपूर्ण अवयव हैं, इसमें सभी कालरूप, २ वचन, २ लिंग (निर्जीव वस्तुओं को भी पुल्लिंग या स्त्रीलिंग दिया जाता है), वैयाकरणिक लिंग (विशेषण, क्रिया शब्द, आदि लिंग के आधीन हैं) उपस्थित हैं। कहा जा सकता है कि सभी अन्य भारो - आर्य भाषाओं से हिंदी की थोड़ी - बहुत समानता है।

२. पंजाबी - पंजाब की भाषा (दोनों भारत और पाकिस्तान की अलग - अलग पंजाबी उपभाषाएँ हैं), और हिमाचल प्रदेश, जम्मू की भाषाएँ भी इससे काफ़ी मिलती हैं। इसका व्याकरण हिंदी से बहुत मेल खाता है।  इसमें 'घ', 'झ', 'ढ', 'ध', 'भ' वर्णों के उच्चारण हिंदी से भिन्न हैं और बोलने का ढंग भी कुछ अलग है, और इसका एक अक्षर 'ळ' हिंदी में नहीं मिलता।  । 

३. बंगाली - बंगाल की भाषा (दोनों भारत और बांगलादेश की अपनी - अपनी उपभाषाएँ हैं), और सबसे प्रचलित पूरब भारतीय भाषा है। असमिया से भी कुछ मिलती है। इसमें और अन्य पूर्वी भारो - आर्य भाषाओं के जैसे ही, 'होना' क्रिया शब्द के रूप उद्देश्य और वस्तु दोनों के होते हुए जोड़े नहीं जाते, एवं वैयाकरणिक लिंग इसमें नहीं होते, और वचनों का क्रिया शब्दों पर कम प्रभाव पड़ता है। इस भाषा में 'अ', 'ऐ', 'औ', 'ण', 'र', 'स', 'क्ष', 'ज्ञ' के उच्चारण हिंदी से पृथक हैं। 

४. गुजराती - गुजरात की भाषा। इसका व्याकरण हिंदी और मराठी, दोनों से थोड़ा - बहुत मिलता है। इसमें 'ऋ', 'ॠ', 'लृ', 'ॡ', 'ऐ', 'औ', 'ज्ञ' के उच्चारण हिंदी से अलग हैं, और इसका एक अक्षर 'ळ' हिंदी में नहीं मिलता। 

५. मराठी - महाराष्ट्र की भाषा। व्याकरण हिंदी और गुजराती दोनों से थोड़ा - बहुत मिलता है। इसमें 'ऋ', 'ॠ', 'लृ', 'ॡ', 'ऐ', 'औ', 'च', 'ज' 'झ', 'ज्ञ' के उच्चारण हिंदी से अलग हैं, और इसका एक अक्षर 'ळ' हिंदी में नहीं मिलता।  

६. ओड़िया - ओड़िशा की भाषा, झारखण्ड में भी बोली जाती है, और पूरब छत्तीसढ़ की भाषाएँ भी इससे बहुत मिलती हैं। व्याकरण पूर्वी भारतीय भाषाओं के वर्ग का है, तो इसमें भी 'होना' क्रिया शब्द के रूप उद्देश्य और वस्तु दोनों के होते हुए जोड़े नहीं जाते, एवं वैयाकरणिक लिंग इसमें नहीं होते, और वचनों का क्रिया शब्दों पर कम प्रभाव पड़ता है। इस भाषा में 'अ', 'ऋ', 'ॠ', 'लृ', 'ॡ', 'ऐ', 'औ', 'श', 'ष', 'क्ष', 'ज्ञ' के उच्चारण हिंदी से पृथक हैं, , और इसका एक अक्षर 'ळ' हिंदी में नहीं मिलता। 

७. संस्कृत - प्राचीन भारो - आर्य भाषा जिससे दूसरी भारो - आर्य भाषाएँ निरूपित हुईं।  इसके दो रूप हैं, वैदिक संस्कृत और शास्त्रीय संस्कृत। वैदिक संस्कृत वैदिक काल तक ही बोली जाती थी और शास्त्रीय संस्कृत उसका परवर्ती रूप है जो थोड़ा अलग है, और जिसके वैयाकरणिक नियम पाणिणि ने बताए। यह एक साहित्यिक भाषा ही रही है और पिछले समय में क्षेत्रीय प्राकृत भाषाएँ बोलचाल में बरती जाती थीं, जिनके विकास से आज की भारो - आर्य भाषाएँ उपजी हैं। इसका व्याकरण किसी एक और भाषा से नहीं मिलता, समानता रखते हुए भी कई रीतों से अलग है। 'ऐ', 'औ', 'ज्ञ' और कहीं - कहीं 'अं' की उचराइयाँ हिंदी से अलग हैं, और प्रत्येक अक्षर के बाद ज्यों के त्यों 'अकार' का उच्चारण भी होता रहता है, जो पूरी तरह से किसी भी पश्चात्कालीन भाषा में नहीं दिखता।  

अगले लेखों में हिंदी के माध्यम से ये भाषाएँ धीरे - धीरे सिखाई जाएँगी।

Sunday, May 29, 2016

Mahakavya - Paurush lalitya varnan

पौरुष सुंदरता को बरनता हुआ एक लमछुआ काव्य - महाकाव्य! इसे मैंने ब्रजभाषा में लिखा है, और शास्त्रीय ढंग (पुरानी पारंपरिक विधि) में लिखने की कोशिश की है, यद्यपि हिंदी भाषाओं की अपनी अनूठी शब्दावली से भी बहुतेरे शब्द लिए हैं।

महाकाव्य - लालित्य वर्णन 

कवि - विदुर सूरी

अति ललित सुंदर रूप कुँ बरनौं रसिकन मनहिं हरनवारौ ब्योरौ
सब अंग अँगेट नर के सुघड़ाई भरे, छबीले अभिरूप सुरूप गँठीले बीर के

गोल मेंडरौ - सौ सिर काले केसनि सौं घिर्यौ चाँद तें माथे लौं पीठ पर घनौ उफान
जैसे तल पै हरी - भरी हरियाली ह्वै बिछी, झाड़ की चहुँ दिसि घने पातन कौ ढेर

माथौ चौड़ो बिनु झूरी, नीके वाके भौंह - जोड़ी, उठी, पैने खाँड़े की धार दिसैए को जीतत
आँखें लंबी गोल, पुतली को धरी पूरी भईं, धरे सेते कोएहुँ, औ दीठि चितवन प्यारी

लंब - दीह डील की नाक तगड़ी सुछेदित, कड़े मोटे गाल चौड़े, ज्यों गूली अरु नारंगी
मुँह के होंठ मँझोले मुटापे के, बाछें फूली - सी, मुस्कान स्मित मीत बनाइबे न्योतत है

दिसत दसन दाड़िम कनी की भाँतिन होंठ कुँदरू के ज्यों
बरन रातौ घनौ लपलप रसना जीभ लंबी - चौड़ी

ठोढ़ी कड़ी तगड़ी कसौटी, तालौ परत धरत चिकनौ ठोस
गलौ कंबु संख ठाढ़ो चौड़ाई बड़ी थाह, कान लंबे छेदभरे, कोमल गोल लोलकी

हँसुली चढ़ी बाँकी धनुस की बँकाई, कंधे गोल चढ़े उभरे टीले धरा तें उठे
पूरौ बल धरी बाँहें अँसन कौ चढ़ाव, सूरबीर तेज थर, परबत की चोटी

छाती चौड़ो सिलपट थूली उपजी खेत, तापै उरज उभरत, पठार पै भीटे
छाती की चौड़ाई देखि नभ कौ पसार लागै, गँठीले के अंगनि मैं लोनाई रंग रंगत

वापर रोम उगे, सिगरी छाती पै फैले, मानो खेत माँहि उपज प्रचुर घान की ह्वै
औ कुच पर चूचियाँ छोटी, चिपटे डौल की, ज्यों बिस्तार धरनी पै छुछुम उभार दोऊँ

भुजान लंबी थूली, चौड़ी अरु गँठीली, बाँहन महामाप की खिसकिकै उभरत
माल की भाँति ढाल पराक्रम कौ प्रतीक उभार ताकौ पौरुख सौंदर्य कौ उभार

तगड़ाई ताकी यों कोऊ मापड़ी तें न मपै, सुडौल भुजाएँ जाकी गाँठें बल तें ह्वैं भरी
थूनी तगड़ी इतेक कि अँकवारी न जावै, कोहनी - सिरे चोखे घाटिन बीच चोटियाँ

टिंडियन कौ घिराव अतुल अगाध थाह, गोल डौल, दीघ डील, पहुँचे भी फूले - से ही
समूचे हाथनि पै, छाती पै, पेट पै, पेड़ू पै, बरन् सबै अंगन पै रोमटे पनपत हैं

कलाई साँकरी पर कछुक मुटापौ लिए पंजे लंबे गोल कादू के पेंदे के ज्यों अटल
हथेली बिछी - सी जापै रेखनि चलत इत - उत जैसे धरनी पर नदियन कौ दल

उँगलियाँ सुडौल सभी पोरें सही नाप की, अँटियाँ उतरीं, नँहन की डीलें सुसीमित
पेट अरु कटि थल पेड़ू कूल्हे अंगु भी, नीकी अँगलेट के ये सिगरे अंग सुढंग

पेट औ उदर पूठे हाटी - काटी बनावट कटि तो अंग भंग और कूल्हे बाहर उभरे
माँझ भाग तन कौ सुघड़ सुपोसित बिध, ईटन कौ टालौ, चटान अटल गठन की

गठन डौल ललित कूलहनि कौ पटि भंग, नाहीं मोटौ, नाहीं झीनौ, अटट बिचलौ डौल
काँखन छिपीं तिनके नीचे पास चौड़े ठोस, बड़ौ घेर वाकौ, छाती भी त्यों ही घेरि कों धरै

बीच सरोनि - उदर, नाभि गहिरी छेद, छबीली बनत तासौं अंगनि की बनावट
समूचे सरीर पर रोएँ बहुतेरे उगे पेट अरु उदर पै पीठि पै प्रति अंग पै

पौरुख अंकुरित जवानी कै वे लिए धज, अनूठी सुंदरता माँहि निखार ते लावैं
पीठ, फैले अंबर की भाँति चौड़ो सिल समतल कड़ो सपाट जाके नीचे हैं कूल्हे गोल

पूठे सौं, चूतड़ तक, काछे सौं पाठे सौं लिंग लग सबै निजी अंगन पर सुबसन
सुरीति सौं अनदिखाऊ ढंग तें ढँके भए, भले पहिनावे तें काहुँ तें भए अनदेखे

कौनूँ बस्तुन गाड़ कों गठरी माँहि जैसे कि बाँधि दियौ कि कछुकहुँ दिखि नाहिंन पावै
सब समय सुबरताव तें छिपे ये अंग विनके नीचे पैर - जोड़ी लकड़ियन जुगल

जाँघें अरु पिंडलियाँ दोऊँ बिरछ के धड़ कहियत, बीच साँकरौ भाग पर चाकियाँ
दोहुँ लंबे, गोल गतकन की सटान लागें, गिलटी पर घुटने जैसे ह्वैं गोल कटोरे

मानियै लाठी के बल अटल अटारी लदी, टिकी, ठोस नींव काहुँ परकार नाहीं हटै
इनि अंगनु पर रोअँन की उपज, नर के फूले सुरूप कै बढ़े - चढ़े छुछुम अंश

पतरी लाठी गाटौ टखने कोने की दोनियाँ सुलंबे पाँव नँहन रमन उँगलियाँ
चिकनी गोल - मटोल एड़ी, सपाट तलवौ, चाल सीधी चोखी सुंदर चलात चरन

या बिध सिख सौं तलवे तलक बरनन नर की सुंदरता कौ भली भांति बतायौ
न जलनि तें, न छूछौ, न भेद - भाव जनक, केवल सुहानी छबि की एक राय बताई

जो लोग या रचना सौं हरख्यौ लिखेरौ भी अत हुलसत है उनकों हरखाइबे पै
जु जन औरे कछु अलगि मत राखत हैं, अपने बिचार पालैं, याकों भी बिकसन देवैं

© Vidur Sury. All rights reserved
© विदुर सूरी। सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, May 28, 2016

Naari ka saaj singar (Kavita)

एक महिला के साज - सिंगार का कविता के द्वारा ब्यौरा - वर्णन....

नारी का साज - सिंगार 

कवि - विदुर सूरी

सुनिए सुनिए छबि का ब्यौरा अति सुन्दर सुरूप साज सिंगार
बरनूँ सज - धज सोलह सिंगार नारी का रूप निखारे जो

सिख पर जूड़ा और चोटी का फूल केस की बेनी वहाँ जड़ें कुसुम
माँग पे लटके टीका सिर से, पास सहारा उसकी पट्टी

माथे बिंदिया टिकली दमके, आँखें काली अंजवाई हुईं
नाक में नथुनी गोल गड़ारी, लौंग छेद में नथने में लगा

होंठ लाल रंगे रंगत से रंगीले डंडे से लीपे
कान के ऊपर गहे कानफूल, नीचे करनफूल झुमके बाली

लटकन लटके लहरे चलते, कभी टिके सहारे से जकड़े
गल पे माला हार नौलखा, रानी का हार, हार हर प्रकार

मोती की लड़ी हार रतन मनि सब मनियों से मालाएँ हों जड़ी
गिरें छाती पर गले से लेकर सिकड़ियाँ लड़ियाँ सुंदर गढ़ीं

कटि पे करधनी तागड़ी हो तन पर सुवसन रंगीला - सा
पीठ पे बँधे चोली उसके नीचे का तन कपड़े से ढंका

रंग ढंग और गढ़ाई मनभावने लहंगा ओढ़नी आड़ शरीर की
टखनों पर नेवर पायल झन - झनकार करे बजके चलते

हाथों पर कंगन कड़े बंगड़ी चूड़ी पहुंचे गजरे भी
उँगली अंगूठी मूठी हथफूल हाथ और पाँव मेहँदी - लीपे

यों बरना सलोना साज - सिंगार सजावट स्त्री - शोभा में निखार
न लोभ, न ओछी दीठ, न भेद, केवल छबि एक राय दिखाई

© Vidur Sury. All rights reserved
© विदुर सूरी। सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, May 27, 2016

Naav ki neenv (Kavita)

जब अपनी नैया टुकड़े - टुकड़े होकर टूट पड़े, तब मन की भावनाओं के आगे अपनी चतुराई और बूझ को रखना पड़ेगा। तभी बच पाएगा डूबनेवाला। इसी से जुड़ी एक कविता, और मेरी वैश्व दृष्टिकोण.....

नाव की नींव 

कवि - विदुर सूरी

क्या किया जाए जब मझधार में
थपेड़ा नाव को लगे उतारने

बाई झकझोरी हिला - डुलाए
चारों ओर अँधेरा छाए

नाव की हर पटरी लगे टूटने
पानी लगे हर छेद से फूटने

कील बिछड़ें नाव रूप खोए
जल बहके हर खूँट डुबोए

मस्तूल धँसे धीरे - धीरे
आँधी पाल को फाड़े - चीरे

पतवार पड़ गए सागर में
न खेवइया, माँझी है धरने

नभ पे डरावना उथल - पुथल हो
कोई न भनक है कि क्या कल हो

न जाने कब घेरनेवाला जल हो
डर तड़पाता हरेक छिन - पल हो

कोई न साथी, कोई न सहारा
और न दिखे एक भी चारा

कैसे चमके आस का तारा
जो मन ने अपना धीर हारा ?

जिया है पहिला डर का मारा
दूसरा है एक हिया बिचारा

लगे की बखेड़ा नहीं जाएगा टारा
अंदर जलें ज्यों धूप में पारा

तब अंत में किया ही क्या जाए
मिटने की होनी देख जी करे हाय - हाय

कैसे दिल को आस दिलाएँ
सूझे किनारा दाएँ न बाएँ

धर्म से घिन, अपने पर आदर
अपनी भूलों को नहीं मना कर

कड़ी स्थिति झेलता चला चल
अलौकिकता है अनहोनी, तू मत दर

बुराई के बढ़ावे को न दे साथ
कला, संस्कृति, भाषा ज्यों सुंदर लाट

हटा बुरी समझ के अपने आघात
बिज्ञान, सबसे बढ़कर है जिसकी बात

टोक न उसे, कर काम उसकी ओर
प्यार नेकी को दे सबसे ऊँचा ठौर

मन न माने, और तू न मनाए
समझ से तरने का नाव बनाए

© Vidur Sury. All rights reserved
© विदुर सूरी। सर्वाधिकार सुरक्षित

Thursday, May 26, 2016

Alaukik bhavon se mat daro (Kavita)

अलौकिक कल्पनाओं के ख़याल हर मनुष्य के मन में उठते हैं, और समझदार होकर भी केवल भय के कारण व्यक्ति इसमें फंसा रहता है। ये मन के सबसे ओछे विचार ही हैं, इनसे मत डरिए, न कभी भी इनके अस्तित्व में विश्वास रखिए। अलौकिक तत्त्व अनहोनी हैं, इसी समझ से अपने इन सबसे घटिए विचारों को उखाड़कर फेंक दीजिए जिसमें इनकी पहचान ही मिट जाए। इस सुविज्ञ, विकसित, आधुनिक युग में ऐसी सोच और ऐसी घबराहट से छुटकारा पाना एकदम बनता है।  तो चलिए, अलौकिकता के फालतू डर से छुटकारा पाएँ और विकास से पग मिलाते हुए आगे बढ़ें !

और इसी के बारे में एक कविता......

अलौकिक भावों से मत डरो ! 

कवि - विदुर सूरी

भूत - प्रेत, हौआ, राछस, असुर, बेताल, चुड़ैल, पिशाच, आदि
सब मन की नीचतम कल्पनाएँ हैं, मत सोचके बनना अनाड़ी

इन सबकी जड़ है डर और बूझ के बिरुध यही काम करे
मन के भाव जब डर बनें, तब जान छोड़ भय को थाम वह लें

और यही डर जब भी छा जाए मन को कभी न शान्ति आए
किन्तु सच्चाई तो यही है कि अलौकिकता की अनहोनी वह भुलाए

डर के भरमाए मन काँपे जबकि कोई न रुकावट हो
अब वह भी किस तरह कल पाए जब संकट की सदा आहट हो ?

पर क्या वास्तव में कोई अलौकिक भयंकर कोई तत्त्व भी है ?
सच तो यह है की यों कुछ भी नहीं, सब डर के घाते घाव ही हैं

मन पे बस रखना होगा जभी इस अनन्त डर को मिटाना हो
हालांकि डर में थरथराओ, तब भी सोच को बल से उठा दो

सारे सोच - विचार, सूझ - बूझ, भाव - रास रोकें आगे बढ़ने से
फिर भी जब सच है कि भूत नहीं, बरबस ही सही निकलो डर से

जब रास डर का हो, मन की कही मत मानो वरन पागलपन यह लगे
ठोस बनकर ललकारो अलौकिकता की होनी को, डर तुम्हें ठगे

चाहे साँप सूँघ जाए तुमको, इस बात पे ही तुम अड़िया बनो
कि अलौकिक, अतिप्राकृतिक किसी बस्तु की अस्ति नहीं, ठानो

अंत में जब तुम दबाव डाल, बिलकुल भी न मानो कि कोई प्रेत है
भय से अगसरके चतुर बनोगे, अपने किए पर तब न खेद है

© Vidur Sury. All rights reserved
© विदुर सूरी। सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, May 25, 2016

Dharm ki khilafat (Kavita)

एक कविता, धर्म की ख़िलाफ़त करने की अपनी सोच व्यक्त करती हुई। कई अनुभवों के परे होने पर हम धर्म के विरुद्ध अपने कड़े विचार और धर्म की तरफ़ अपनी नफ़रत को एक कविता के ज़रिए बयान कर रहे हैं। पाठकों से अनुरोध है कि वे अपनी प्रतिक्रियाओं में धर्म (धार्मिक मान्यता) का साथ देनेवाले मत पर बल देनेवाले तर्क प्रस्तुत नहीं करें। यहाँ एक मान्यता ही पेश की जा रही है। 

धर्म की ख़िलाफ़त 

कवि - विदुर सूरी 

अय धर्म तू बुरा है, अय धर्म तू बला है 
अब न दग़ा खाएँगे, तेरा पता चला है 

अरमानों पे हमारे, बरबादी को उछारे 
ख़ुशियाँ सभी मिटाकर, ग़म से तू हमको मारे 

दिल को यही है लगता, जब फंसे जाल में कि 
धरम है सही जबकि है जिगर को जलाता 

पेंच हैं तेरे दलदल - से, और लगते हैं जो दिल से
अब ज़ुल्म न सहेंगे, न झेलेंगे मुश्किल से 

जब तू ही है गुनहगार, क्यों हम ख़ुद ही को मानें ?
तेरी है, न हमारी ख़ता, यह बात जानें 

कभी अपने रब्ब की तू भरता है ख़ौफ़ दिल में 
कभी ऊंच बन ढकेले हमें नीचों के बिल में 

जिगर का लहू पीकर, और ठोकरें खिलाकर 
उम्मीद झूठी देकर, निराशा रस पिलाकर 

जब हो यक़ीन तुझ पर, ज़ोरों से ही तू छूटे
मजनू बनाके छोड़े, क़ायदे नेक टूटें 

होश पाएँ सच का लेकिन हम जागें नींद से जब 
पर्दाफ़ाश होता है तेरा तब, ओ मज़हब!

तो अच्छाई के ख़ातिर हम धर्म को मिटाएँ 
उठा नक़ाबे - बद को, हम भूल को छिंटाएँ

है इसी में भलाई कि धर्म से करो नफ़रत 
दुश्मने - जानी और दोस्त में तो तुम करो फ़रक़ 

फिर कौन प्रभु अपना, इसका जवाब सुन लो 
वही जो तुम ख़ुद मानो, जो है सही, वह चुन लो 

गर मानो इसलिए कि हिफ़ाज़त मिल जाए 
गर मानना ही न हो, त्यों ही ग़ुल खिल जाएँ 

पर याद रखना हरदम, कि सच्चा ख़ुदा है यही 
आपस की अपनी ख़ैरख़ाही और प्यार से अलग कुछ नहीं 

© Vidur Sury. All rights reserved
© विदुर सूरी। सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday, May 24, 2016

Saphalta sabse madhur maani jaaye - based on Emily Dickinson's 'Success is counted sweetest'

जानी - मानी और आदरणीय कवयित्री स्वर्गीय एमिली डिकिन्सन की अंग्रेजी कविता 'success is counted sweetest' पर आधारित एक हिंदी संस्करण। यह उन्हीं महती कवयित्री को समर्पित है।  

सफलता सबसे मधुर मानी जाए (Success is counted sweetest)

हिंदी संस्करण - विदुर सूरी 
मूल अंग्रेजी संस्करण - एमिली डिकिंसन 

सफलता सबसे मधुर मानी जाए 
सफल कभी न होनेवालों से 
एक अमृत को परखने के निमित भी 
आवश्यकता की आवश्यकता पड़े।  

जामनी रंग के गण में एक भी नहीं 
जिन्होंने विजय ध्वज फहराया 
कर सकते हैं परिभाषा कहके 
कि जीत है वस्तु क्या ?

जब उसने हराया - मरते हुए -
जिसके वर्जित कानों पर 
दूर की जय - जयकार की पड़ी फुहार 
स्पष्ट, संतप्त वह फूटी है आकर

© Vidur Sury. All rights reserved
© विदुर सूरी। सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday, May 23, 2016

Man Apnao Sahi Path (Kavita)

परिश्रम से सफलता पाने के विषय पर हमारी एक कविता रचना, साथ ही साथ धर्म के विरोध के अपने विचारों को माध्यम देते हुए। पाठकों से अनुरोध है कि वे अपनी प्रतिक्रियाओं में धर्म (धार्मिक मान्यता) का साथ देनेवाले मत पर ज़ोर देनेवाले तर्क प्रस्तुत नहीं करें। आपको जो उचित लगता है, उसे आप मान सकते हैं पर इसमें प्रकट किए हुए मत का विरोध नहीं करें। यहाँ एक मान्यता ही पेश की जा रही है।  


मन अपनाओ सही पथ 

कवि - विदुर सूरी 


मन अपनाओ सही पथ
मिलें साँचे मनोरथ
बीचो - बीच जीवन की गत
तभी तुम हो पाओ उन्नत

कभी जो लगे धर्म ही अच्छा
ज़ुल्म ढाएगा, मिटाएगा कच्चा
धर्म की बातें कभी न ठीक
घिन करो उससे हो निर्भीक

काम में थककर जब सूझे
कि धर्म की ज़ुल्मों से जूझें
धर्म तो है झूठा सहारा
भद्दा इतना कि नहीं गँवारा

काम थकाए पैरों को
नदिया पार हो, तैरो तो
धर्म जलाए अपने पाँव
मौत से तो अच्छा है घाव

काम न करने को मन चाहे
ज्यों कि उठाकर गिरा दें बाहें
फिर भी सही गैल है काम
जीसी से मिले निज सुख धाम

काम का दबाव लगे निठुर
पथ पर बिछे हैं बहुत अंकुर
पर जब पार हो राह कठिन
दिखाएगी वह सुनहरे दिन

© Vidur Sury. All rights reserved
© विदुर सूरी। सर्वाधिकार सुरक्षित